Enviroment

क्या उत्तर प्रदेश अपनी ही सनातन परंपराओं को भूल गया है?

जब हमारी पूजा प्रकृति का उत्सव थी, प्रदूषण का नहीं

क्या आधुनिकता की दौड़ में हम अपनी सबसे बड़ी विरासत खो बैठे हैं?

यदि कोई आपसे पूछे कि दुनिया में “सस्टेनेबल डेवलपमेंट” (Sustainable Development) का विचार कब शुरू हुआ, तो अधिकांश लोग संयुक्त राष्ट्र, जलवायु सम्मेलन या आधुनिक पर्यावरण आंदोलनों का नाम लेंगे। लेकिन यदि यही प्रश्न उत्तर प्रदेश की धरती से पूछा जाए, तो उसका उत्तर शायद कुछ और होगा।

यह उत्तर केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रमाणों पर आधारित है। उत्तर प्रदेश की धार्मिक परंपराएँ उस समय विकसित हुईं, जब मनुष्य का जीवन पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर था। कृषि, ऋतुचक्र, नदियाँ, वन, पशुधन और स्थानीय संसाधन केवल जीवनयापन का आधार नहीं थे, बल्कि धार्मिक जीवन का भी अभिन्न हिस्सा थे। परिणामस्वरूप पूजा-पद्धतियाँ भी ऐसी विकसित हुईं, जिनमें प्रकृति का सम्मान केवल उपदेश नहीं, बल्कि व्यवहार का हिस्सा था। उस समय पर्यावरण संरक्षण कोई अलग अभियान नहीं था; वह दैनिक जीवन की सहज अभिव्यक्ति था।

क्योंकि यही वह भूमि है जहाँ सदियों पहले ऐसी पूजा-पद्धतियाँ विकसित हुईं जिनमें कुछ भी व्यर्थ (Zero Waste) नहीं जाता था। पूजा में प्रयुक्त हर वस्तु—मिट्टी, आटा, चावल, हल्दी, पत्ते, बाँस, गोबर, कपास, घी, सरसों का तेल—या तो धरती में मिल जाती थी या किसी जीव का भोजन बन जाती थी। यहाँ तक कि घर के द्वार पर बनाया जाने वाला चौक भी केवल सजावट नहीं था; वह चींटियों और सूक्ष्म जीवों के लिए दैनिक भोजन था।

आज स्थिति बदल चुकी है। धार्मिक उत्सवों में प्लास्टिक, थर्मोकोल, रासायनिक रंग, प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP), चमकीले सिंथेटिक सजावटी पदार्थ और एकल-उपयोग वाली वस्तुएँ सामान्य हो गई हैं।

प्रश्न यह नहीं है कि धर्म पर्यावरण के लिए अच्छा है या बुरा। प्रश्न यह है कि क्या हमने अपनी ही मूल परंपराओं को बदल दिया है?

उत्तर प्रदेश: केवल तीर्थभूमि नहीं, प्रकृति और अध्यात्म का संगम

उत्तर प्रदेश को केवल एक राज्य के रूप में नहीं देखा जा सकता। काशी, अयोध्या, प्रयागराज, मथुरा, वृंदावन और चित्रकूट जैसे तीर्थ हजारों वर्षों से भारतीय आध्यात्मिक जीवन की धुरी रहे हैं। गंगा, यमुना और सरयू जैसी नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं, बल्कि धार्मिक चेतना का आधार रही हैं।

इसी कारण यहाँ की पूजा-पद्धतियाँ स्थानीय भूगोल, नदियों, मिट्टी, कृषि और ऋतुचक्र के अनुरूप विकसित हुईं। इनका उद्देश्य केवल ईश्वर की आराधना नहीं था; प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना भी था।

सनातन दर्शन में पर्यावरण कोई “संसाधन” नहीं, परिवार है

आज पर्यावरण संरक्षण को वैज्ञानिक दृष्टि से समझाया जाता है। लेकिन वैदिक परंपरा ने इसे आध्यात्मिक उत्तरदायित्व बना दिया था। भूत यज्ञ की अवधारणा कहती है कि मनुष्य केवल अपने लिए नहीं जीता। उसके जीवन में पशु, पक्षी, कीट, वनस्पति और सूक्ष्म जीवों का भी समान अधिकार है।

यही कारण है कि भारतीय घरों में पक्षियों के लिए दाना, गाय के लिए पहली रोटी, चींटियों के लिए आटा और जलाशयों में मछलियों के लिए भोजन जैसी परंपराएँ विकसित हुईं। यह केवल करुणा नहीं थी—यह एक पारिस्थितिक व्यवस्था (Ecological System) थी।

जब मूर्तियाँ भी प्रकृति का हिस्सा बन जाती थीं

आज अधिकांश लोग “इको-फ्रेंडली मूर्ति” का अर्थ केवल मिट्टी की मूर्ति समझते हैं। लेकिन पारंपरिक उत्तर प्रदेश इससे कहीं आगे था। धार्मिक ग्रंथों और लोक परंपराओं में ऐसी मूर्तियों का उल्लेख मिलता है जो बनाई जाती थीं—

  • गेहूँ के आटे से
  • चावल के आटे से
  • गुड़ से
  • हल्दी से
  • कच्ची मिट्टी से
  • बाँस और भूसे से
  • प्राकृतिक गोंद और वनस्पति रंगों से

पूजा समाप्त होने के बाद जब इनका विसर्जन होता था, तो आटे और गुड़ से बनी प्रतिमाएँ मछलियों तथा अन्य जलीय जीवों के लिए भोजन बन जाती थीं। मिट्टी नदी में घुलकर उसी मिट्टी का हिस्सा बन जाती थी जहाँ से वह आई थी। यह “धरती से लिया, धरती को लौटाया” का वास्तविक उदाहरण था।

फिर ऐसा क्या बदला?

बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में धार्मिक आयोजनों का स्वरूप तेजी से बदलने लगा। विशाल सार्वजनिक पंडाल, ऊँची प्रतिमाएँ, चमकदार सजावट और व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा बढ़ी। बड़ी मूर्तियों के लिए प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) सुविधाजनक था। वह हल्का था, जल्दी सूखता था और कम लागत में बड़ी प्रतिमाएँ बनाई जा सकती थीं। धीरे-धीरे यही नई सामान्य परंपरा बन गई। यहीं से पर्यावरणीय संकट भी शुरू हुआ।

चौक पूरना: उत्तर प्रदेश की सबसे अनोखी पर्यावरणीय परंपरा

यदि किसी विदेशी पर्यटक से पूछा जाए कि भारतीय घरों के बाहर बनाई जाने वाली रंगोली का उद्देश्य क्या है, तो वह शायद कहेगा—”घर को सुंदर बनाना।” यदि किसी आधुनिक शहरी से यही प्रश्न पूछा जाए, तो उसका उत्तर होगा—”शुभ अवसर पर सजावट करना।”

लेकिन यदि यही प्रश्न उत्तर प्रदेश के किसी पुराने ग्रामीण परिवार की दादी या नानी से पूछा जाता, तो संभव है कि वे मुस्कुराकर कहतीं— “यह केवल सजावट नहीं है, यह सेवा है।”

सेवा किसकी? केवल देवी-देवताओं की नहीं। उन छोटे-छोटे जीवों की, जिन्हें हम अक्सर देख भी नहीं पाते।

जब चौक केवल कला नहीं, करुणा था

उत्तर प्रदेश में चौक पूरना केवल सौंदर्य का विषय नहीं था। यह धर्म, लोकजीवन, कृषि और पर्यावरण के बीच गहरे संबंध का जीवंत प्रतीक था। दीपावली हो, अहोई अष्टमी, करवा चौथ, गोवर्धन पूजा, विवाह, नामकरण, अन्नप्राशन या कोई अन्य शुभ संस्कार—घर के आँगन और मुख्य द्वार पर चौक अवश्य बनाया जाता था। लेकिन उस चौक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसका रंग नहीं, बल्कि उसका सामग्री-विज्ञान (Material Science) था।

वह तैयार होता था— गेहूँ के आटे से, चावल के आटे से, हल्दी से, रोली और कुमकुम जैसे प्राकृतिक पदार्थों से, दालों और अनाज से, कभी-कभी फूलों की पंखुड़ियों, पिसी हुई पत्तियों और प्राकृतिक मिट्टी से। इनमें से कोई भी पदार्थ कृत्रिम नहीं था। प्रत्येक वस्तु प्रकृति से आई थी और अंततः पुनः प्रकृति में ही लौट जाती थी।

सुबह का एक दृश्य, जो पर्यावरण विज्ञान समझा देता है

कल्पना कीजिए— भोर का समय है। घर की बुज़ुर्ग महिला आँगन में झाड़ू लगाती हैं। फिर गोबर और मिट्टी से ज़मीन लीपती हैं। उसके बाद एक पीतल की कटोरी में थोड़ा-सा गेहूँ का आटा, चावल का आटा और हल्दी मिलाकर चौक बनाती हैं। कुछ ही मिनटों में चींटियों की कतार उस चौक तक पहुँच जाती है। थोड़ी देर बाद गौरैया आँगन में उतरती है। कभी कोई गिलहरी भी आ जाती है। दिन चढ़ने तक चौक का अधिकांश भाग इन छोटे-छोटे जीवों का भोजन बन चुका होता है।

पूजा समाप्त हो चुकी है। लेकिन जीवन की एक और श्रृंखला शुरू हो चुकी है। आज के वैज्ञानिक इसे फूड वेब (Food Web) या ट्रॉफिक नेटवर्क का हिस्सा कहेंगे। हमारे पूर्वज इसे केवल ‘पुण्य’ कहते थे।

हल्दी केवल रंग नहीं थी

चौक में हल्दी का प्रयोग लगभग अनिवार्य था। पारंपरिक समाज उसके औषधीय गुणों से परिचित था। हल्दी प्राकृतिक रूप से रोगाणुरोधी (Antimicrobial) और अनेक कीटों को दूर रखने वाले गुणों के लिए जानी जाती है। घर के प्रवेश द्वार पर हल्दी का उपयोग केवल शुभता का प्रतीक नहीं था; यह स्वच्छता और स्वास्थ्य (Bio-shield) से भी जुड़ा हुआ था।

क्या यह दुनिया की पहली “बायोडायवर्सिटी सपोर्ट सिस्टम” थी?

आधुनिक पारिस्थितिकी हमें बताती है कि किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूती उसके सबसे छोटे जीवों पर निर्भर करती है। यदि प्रतिदिन लाखों घरों के बाहर आटे और अनाज का चौक बनाया जाए, तो कल्पना कीजिए कि कितने असंख्य सूक्ष्म जीवों को भोजन मिलता होगा। किसी सरकारी योजना के बिना, किसी बजट के बिना… सिर्फ़ एक सांस्कृतिक परंपरा के माध्यम से।

जब पत्तल और कुल्हड़ “ग्रीन टेक्नोलॉजी” थे

आज जैविक उत्पादों को आधुनिक नवाचार कहा जाता है। लेकिन हमारे पूर्वज पहले से ही उनका उपयोग कर रहे थे:

  • पत्तल और दोना: जो उपयोग के बाद खाद बन जाते थे।
  • कुल्हड़ और मिट्टी के दीपक: जो वापस मिट्टी में मिल जाते थे।
  • बाँस की टोकरियाँ और रूई की बाती।

इसके विपरीत आज के प्लास्टिक और थर्मोकोल दशकों तक पर्यावरण में बने रहते हैं और अंततः सूक्ष्म प्लास्टिक (माइक्रोप्लास्टिक) में बदल जाते हैं।

छठ पूजा: आज भी जीवित है वह परंपरा

पूर्वांचल की छठ पूजा इस बात का प्रमाण है कि धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं। पूरे पर्व में बाँस, मिट्टी, मौसमी फल, स्थानीय कृषि उत्पाद और प्राकृतिक सामग्री का उपयोग होता है। पूजा का केंद्र नदी है, इसलिए जल की पवित्रता स्वयं इस परंपरा का हिस्सा है।

पवित्र उपवन: भारत के पहले “नेचर रिज़र्व”

यदि आज किसी पर्यावरणविद् से पूछा जाए कि जैव विविधता की रक्षा का सबसे प्रभावी तरीका क्या है, तो वह संभवतः “प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट” या “बायोस्फीयर रिज़र्व” का उल्लेख करेगा। लेकिन भारत के गाँवों ने सदियों पहले बिना किसी सरकारी अधिसूचना के ऐसे प्राकृतिक अभयारण्य विकसित कर लिए थे, जिन्हें हम आज पवित्र उपवन (Sacred Groves) के नाम से जानते हैं।

उत्तर प्रदेश के अनेक क्षेत्रों में ऐसे उपवन विभिन्न नामों से प्रसिद्ध रहे—कहीं कालीथान, कहीं समय थान, कहीं भैरव बाबा का स्थान, तो कहीं देवी का जंगल। इन उपवनों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इन्हें किसी कानून ने नहीं, बल्कि लोक-आस्था ने बचाया। गाँव के लोग मानते थे कि इन वृक्षों में ग्राम-देवता का निवास है। वहाँ से वृक्ष काटना या शिकार करना धार्मिक अपराध माना जाता था।

आज वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि इन उपवनों में विलुप्तप्राय औषधियाँ, दुर्लभ पक्षी और परागण करने वाले कीट सुरक्षित हैं। ये ग्राउंडवॉटर रिचार्ज (Groundwater Recharge) और तापमान नियंत्रण में अहम भूमिका निभाते हैं। हमारे पूर्वजों ने संरक्षण को कानून का विषय नहीं, संस्कार का विषय बनाया।

निष्कर्ष: क्या हमें अपनी ही परंपराओं से सीखने का समय आ गया है?

आज न्यायालय और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड प्राकृतिक मूर्तियों और रंगों के उपयोग के निर्देश दे रहे हैं। ये नियम किसी नई परंपरा को जन्म नहीं देते, वे उसी सांस्कृतिक ज्ञान की ओर लौटने का प्रयास हैं जो कभी हमारी जीवनशैली का हिस्सा था।

आज पूरी दुनिया “ग्रीन टेक्नोलॉजी” खोज रही है। लेकिन उत्तर प्रदेश की परंपराएँ बताती हैं कि हमारे पूर्वजों ने तकनीक नहीं, जीवनशैली विकसित की थी।

  • ऐसी जीवनशैली जिसमें पूजा के बाद कचरा नहीं बचता था।
  • जिसमें मूर्तियाँ नदी को प्रदूषित नहीं करती थीं।
  • जिसमें चौक चींटियों का भोजन था।

शायद आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि सनातन धर्म पर्यावरण-अनुकूल है या नहीं। बल्कि प्रश्न यह है— क्या उत्तर प्रदेश अपनी ही सनातन परंपराओं को भूल गया है?

यदि उत्तर “हाँ” है, तो समाधान किसी नई विचारधारा में नहीं, बल्कि अपनी उसी सांस्कृतिक स्मृति में छिपा है जिसने हजारों वर्षों तक अध्यात्म और प्रकृति को एक-दूसरे का पूरक बनाए रखा। प्रकृति की सेवा ही परम पूजा है।

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Prabhanshu is an educator with a B.Ed. degree, a passionate photographer, and an advocate for environmental awareness. He combines his teaching expertise with a love for visual storytelling to showcase the beauty of nature while emphasizing the importance of its...
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